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Thursday 3 May 2012

जूनी नाव



जूनी नाव बुने सन्नाटा
कहती करूनं कहानी     
दुल्हन सी थी नई नवेली 
सुख सपनों की रानी 
नाचा करती थी लहरों से 
मीरा सी दीवानी 
भूले नहीं भूलती उसकी 
तन मन भरी रवानी 
जीवन रेखा थी बहुतों की
 किया न कभी बहाना
गंगा जमुना के संगम में 
सहजा ठौर ठिकाना 
प्रलय बाढ़ झंझावातों में
 मनु   की बुनी कहानी 
बूढ़े बरगद से ज्यों करती 
छाया सदा किनारा 
बैसे ही नाविक ने छोड़ा 
समझ उसे नाकारा 
रह रह हूक उठे अंतस में 
जग करता मनमानी
[भोपाल :05.03 2008 ] 

Tuesday 10 April 2012

स्रष्टि सृजन सन्देश !

हाय हाय यह कैसा देश
अरे हाय कैसा परिवेश

    माँ बापू ही पीछे पड़ते
    पल पल बढ़ना मेरा पढ़ते
   पहचान हुई जैसे ही मेरी
  घुसुर पुसुर आपस में करते
बदला बदला उनका सोच
आनन से झलके अफ़सोस
    
      रहे बांस ना बजे बाँसुरी
      चल पड़ते हैं राह आसुरी
      भ्रूण ह्त्या पाप ना समझे
      खुश हों बजा बजा कर तारी
देते हैं सबको उपदेश
लड़के  की है चाह विशेष

      जैसे तैसे पैदा हौऊँ
      पड़ी पड़ी कचड़े में रौऊँ 
      बाँझ बिबस पत्थर दिल पिघले
      घर आँगन में खुशियाँ बौऊँ 
रचूँ नया इतिहास अशेष
स्रष्टि सृजन बांटूं सन्देश
[भोपाल ०८.०४.२०१२]  


Wednesday 29 February 2012

होली त्योहार

                                         होली का त्योहार
जो
लाये त्योहार
वो
होली त्योहार
वन उपवन में बौर
महक उठे हर ठौर
फागुन  फाग दौर
वसंत के सिरमौर
जो
रख दे त्योहार ...

रंग बिरंगे रंग
जन गण मन के संग
सबमें भरे उमंग
बरसाने मानिंद
जो
मनता त्योहार ...

लिखे  परीक्षा छंद
बचपन हो स्वच्छंद 
खेलकूद अनुबंध
रेशम से सम्बन्ध 
जो
रच दे  त्योहार
बो
होली त्योहार
[भरूच:०१.०३.२००२]

Monday 9 January 2012

शत प्रतिशत वे मानी है

सचमुच में बेमानी है !
सूरज से
यह कहना
सूरज रे
जलते रहना
सचमुच में बेमानी है !
dhadkan
जब से उसने होश संभाला
बांटा सहस्त्र करों से उजाला
जहां कहीं भी तम का डेरा
रोज़ सुबह से डेरा डाला
ऐसे सूरज
से कहना
सूरज रे
जलते रहना
सचमुच में बेमानी है !

सूरज जब तक ताप न देता
 सागर तबतक भाप न देता
टस से मस न होता मौसम
जब तक सूरज संकेत न देता
धड़कन है
सबकी सूरज
ऐसे सूरज से
यह कहना
सूरज रे
जलते रहना
सचमुच में बेमानी है !

दुनिया में जीवन की बाती
सबको है सूरज की थाती
हँसने गाने को जो लिखता
बिना चूक के अनुपम पाती
यों ही जबरन
टांग अड़ाना
सूरज से
कहना
सूरज रे
जलते रहना
शत प्रतिशत वे मानी है !
[ह्यूस्टन : अमेरिका :०९.०१.२०१२]

Saturday 7 January 2012

सूरज से जलते रहना

रामदीन से
यह कहना
सूरज से
जलते रहना
सचमुच में बेमानी है १
जबसे उसने होश सभाला
नहीं चैन  से मिला निबाला
दस्तक देता रहा दिवाला
गम के घूँट
पिया करता
उससे तब
कहना
सूरज से हँसते रहना
सचमुच में बेमानी है !

छानी छप्पर उड़े हवा में
खेत टपरिया बिके दवा में
जान नहीं है हाथ पाँव में
तन मन  है
जिसका ठठरी
उससे तो 
यह कहना
सूरज से खिलते रहना
सचमुच में बेमानी है !

जिसके घर में दिया न बाती
हवा न कोई आती जाती
तन तन नहीं फोन की होती
रेशम धागे
राख़ हुए
रामदीन से
यह कहना
सूरज से जलते रहना
सचमुच में बेमानी है !
[सैंट जॉन कनाडा :०६.१२.२१२]


Monday 2 January 2012

नए वर्ष
के
नव विहान
में
जी करता
हर बच्चे
का
खेल खिलौना बन जाऊं !
बापू का था
खाली खलीता
पानी पी -पी
शैशव जीता
दुनिया जिनको
कहे गरीब
बदलू उनका
तुरत नसीब
नए वर्ष में सब खुशियाँ ले
सुखद बिछौना बन जाऊं !
श्रम में जिनका
जीवन जीता
भाग न उनका
होता रीता
लिखते हैं वे
नई   किताब
खिलते बनकर
नया गुलाब
क ख ग घ परिभाषा में
हर बचपन को समझाऊँ
[सैंट जों न : कनाडा :०३.०१.२११२]

Wednesday 28 December 2011

अपना घर

यह तो
अपना घर
यहाँ
कौन सा डर?
खिड़की दरबाजे बजा रहे ताली
बरसों बाद मिलन नचती खुशहाली
घर हो
जगर मगर
तम हो
तितर बितर
ठहरो ठहरो घर बुला रहा तुमको
दशों दिशाएँ अवनी अम्बर जाने
बहे खबर
सर सर
निर्झर -सी
झर झर
असमंजस का तम उड़े हवा में फर फर
रेशम धागे प्रेम दिवाने सचमुच तर बतर
बिछ बिछ
जाए घर
शहद सा
है स्वर
[सैंट जॉन :कनाडा :०७.११.२०११]